संदेश

फ़रवरी 13, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मन की हलचल

 ये मन भी बहुत विचित्र होता हैं ! जाने कहाँ कहाँ से इसमे विचारों के मेहमान आ जाते हैं ,आते हैं तो आये जी !लेकिन आ करके बसने लगते हैं !मन ही में ,और फिर बैचेन करने लग जाते हैं मन को ,कितना रोकने की करूँ कोशिशें की कोई अनचाहा विचार रूपी मेहमान चला जाये वापस ! लेकिन वो जाएगा तब ही जब पूरी तरह से मन ही उसकी और देखना बन्द करदे ! और यही तो मन को भी करने में  ही अपने आप को समझना बड़ा कठिन होता हैं , कभी कभी तो इस मन में ऐसे ऐसे मेहमान चले आते हैं जिनके बारे में कभी सोचा ही नही मन ने भी की उसे ऐसे भी ख्याल आ सकते हैं !  और उन्ही ख्यालों से जीवन की दशा-दिशा ही परिवर्तित हो जाती हैं ,मन मे घर ही बसा लेते हैं कोई विचार तो ! कभी कोई विचार तो ऐसी हमचल मचा देते हैं दिलोदिमाग में की पूरा अस्तित्व ही बदल जाता हैं व्यक्ति का ,व्यक्तित्व ही परिवर्तित होजाता हैं ! मन में जरूरी नही की हर समय गलत ही या नकारात्मकता वाले ही मेहमान आते हैं विचारों के !पोजेटिव  विचारों के मेहमान भी पधारते हैं मन मे! और उन्ही के कारण ही व्यक्ति कुछ अच्छा और रचनात्मक कर जाता हैं। ये मन हैं साहब!मन !बहुत बारीकिय...

नारी रूप हैं शक्ति का

नारी रुप हैं शक्ति का ! क्यों कर दिया उसे निःशक्त हैं! सभी करते कोशिस हैं नारी पर  शक्ति को अपनी चलाने का ! जन्म होता हैं जब कन्या रूप नारी का , बाबुल का घर न  है उसका अमानत हैं वो  पराये की ,धन भी कही जाती हैं वो दूसरे का बन जाती जब नव युवती रूप नारी का बाबुल कर देते विदा थमा हाथ पुरुष पराये का होता हैं अब शुरू संघर्ष  नारी जीवन के अस्तित्व का कौन हैं वो ? क्या होगा नाम उसका ? किस घर से आई? क्या घर भी हैं कोई उसका ? जिस घर में थी जड़ें उसकी , उखड़ना था वहाँ से नियति उसकी , जिस घर में रोपने को जड़ें खुद की थी गई , वहाँ भी तो रही वो बन कर , घर पराये से हैं आई  की, घर पिता के रही! घर पति के रही! रही घर पुत्र के वो नारी थी न घर उसका बना कभी  रहा वो घर उन्हीं सब का नारी घर से बेघर ही रही , फिर भी नारी रूप हैं शक्ति का क्यों कर दिया उसे निःशक्त हैं! नारी तो रूप हैं त्याग समर्पण शक्ति का ! देती समर्पण पुरूष को  अपने प्यार की रति शक्ति का नारी अपना सर्वश्व लुटाती , देती अपनी कोख पुरूष को! लाने को वंशज उसके,पीढ़ी का देती वो अपने...