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फ़रवरी 9, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हमसफ़र

बहुत उम्मीद थी ,थी बहुत आरजू भी मेरी साथ चलने की तेरे ,बन के हमसफ़र तेरी हम कदम जो  बनते मेंरे तुम ,मैं हमनशीं तेरी फूल तो तुम ही थे , खुशबु मैं बन जाती तेरी अक्स मेरा ही हो उनमें ,बस वो निगाहें हो तेरी अश्क जो मेरे बहें आँखों से , बस वो पलकें हो तेरी गीत तेरे ही मैं गाउँ ,धुन हो  वो बस तेरी साज़ मेरे ही  बजे , राग उनमें हो बस तेरी  ‌

क्या कीजे

जख्म हो तन पर तो दवा कीजे,  घायल हैं रूह फिर क्या कीजे! कटे अंग की सिलाई कीजे, फटे मन फिर क्या कीजे! चोट लगे तीर कमानो से तो दिन दश-पाँच में भरा कीजे, बन जाते नासूर नश्तर शब्दबाणों के  फिर क्या कीजे! मैला हैं  लिबास तो जल से धुला कीजे, हो गर मन मैला फिर क्या कीजे! गिरे अर्स से फर्स पर तो कभी न कभी उठा कीजे, गिर जाए नजरों से फिर क्या कीजे! रूठे मानव, मनाया कीजे, रूठ जाये रब फिर क्या कीजे!