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नई सुबह

 वो सुबह  भी आयेगी! की जब होंगे दूर अंधेरे गमों के, और छटेंगे बादल दर्द  भरी आहों के हाँ वो सुबह कभी तो आयेगी!!.... वो सुबह भी आयेगी की जब पड़ेगी चेहरे पर उजली उषा के ओस की बूंदों के छिंटे  और नमक आसुंओ का धूल जायेगा, हाँ वो सुबह कभी तो आयेगी!!.... वो सुबह भी आयेगी की जब तन-मन पर बौछार करेंगी किरणें भानु- भाष्कर के प्रकाश की  और होठों पर खिलेंगी कलियाँ मुस्कराकर खिलखिलाने के साज के आगाज की   हाँ वो सुबह कभी तो आयेगी!!....

चाहत

  इतना चाहते अगर रब को , जितनी इबादत करते हम तुम्हारी मोहब्बत की, तो रब भी मिलही जाते हमे ! या फिर ये नाराजगी है हमसे रब की !कि उनसे ज्यादा हम कलमा पढ़ रहे नाम का तेरे! और रब ही रूठे ऐसे हमसे की गम जुदाई का सहना पड़ रहा हमे हैं तुमसे! कैसे जियूँ एक पल भी तेरे बिना नहीं  आता जीना, ऐसा बना दिया तुमने मुझेअपना दीवाना ! इस जीने से बेहतर हैं मुझे ए मेरे खुदा तूँ अपने ही पास बुलाना! जब वो सूरत न मिले निहारने को, फिर निगाहे ही क्यों रहे मेरी कुछ भी देखने को! साथ तेरा न  मिले जिंदगी के सफ़र में साथ चलने को, फिर हम जिंदा रहे ही क्यों ? अकेले गम-ए-जुदाई का सफर करने को!

मेरा पिया

मेरीआँखों में चमक बन ,बसे कजरा तुम हो पिया! मेरे माथे पर बन शोभा मेरी ,बैठे बिंदिया तुम हो पिया! मेरी माँग में सजकर सिंदूर, मेरा सौभाग्य बने तुम हो पिया! मेरे होठों पर सुर्ख गुलाबों सी लाली बन सजे मेरे रूप को सजा रहे तुम हो पिया! मेरे हाथों में हरी मेहदी से  लाल बन रचे हथेली में मेरे प्यार का रंग तुम हो पिया! मेरे तन पर  खिलते रंगीन  लीबाज़ों के तानोबानो के हर तार का  रंग तुम हो पिया! मेरे गले में नवसर हार के मोतियन की आब मेरे रूप का श्रृंगार तुम हो पिया! मेरी अंगुली में सजी अंगूठी के हीरों की आभा का आकार तुम हो पिया! मेरे हाथों में कंगनों की खनक का साज तुम हो पिया! मेरी बिछिया के नग का रंग और मेरी पायजेब जी छन -छन की झंकार मेरा सम्पूर्ण उल्लास तुम हो पिया! मेरे दिल में अपने प्रेम के  गुलों से गुलिस्तां सजाकर मेरी सासों में महकती खुशबू  तुम हो पिया! मेरे तनमन में ,मेरे रोम रोम में ,वीणा के तारों सी बज रही सितार ,मेरे प्रेमसँगीत का राग तुम हो पिया! मेरे कोरे कागज से मन पर अपने प्यार की स्याही और कलम से रचना प्रेम की मुझपर लिख कर   ,मुझे प्रेमग्रंथ ब...

दिल न होता

काश ये दिल न होता ! दिल हैं तो हैं , काश ये प्यार न होता ! प्यार हैं तो हैं, काश इस दिल में प्यार न होता ! इस दिल मे प्यार हैं तो हैं , काश  इस दिल में प्यार के दर्द का अहसास न होता ! काश इस दिल में ,दिल ही न होता !

मन की हलचल

 ये मन भी बहुत विचित्र होता हैं ! जाने कहाँ कहाँ से इसमे विचारों के मेहमान आ जाते हैं ,आते हैं तो आये जी !लेकिन आ करके बसने लगते हैं !मन ही में ,और फिर बैचेन करने लग जाते हैं मन को ,कितना रोकने की करूँ कोशिशें की कोई अनचाहा विचार रूपी मेहमान चला जाये वापस ! लेकिन वो जाएगा तब ही जब पूरी तरह से मन ही उसकी और देखना बन्द करदे ! और यही तो मन को भी करने में  ही अपने आप को समझना बड़ा कठिन होता हैं , कभी कभी तो इस मन में ऐसे ऐसे मेहमान चले आते हैं जिनके बारे में कभी सोचा ही नही मन ने भी की उसे ऐसे भी ख्याल आ सकते हैं !  और उन्ही ख्यालों से जीवन की दशा-दिशा ही परिवर्तित हो जाती हैं ,मन मे घर ही बसा लेते हैं कोई विचार तो ! कभी कोई विचार तो ऐसी हमचल मचा देते हैं दिलोदिमाग में की पूरा अस्तित्व ही बदल जाता हैं व्यक्ति का ,व्यक्तित्व ही परिवर्तित होजाता हैं ! मन में जरूरी नही की हर समय गलत ही या नकारात्मकता वाले ही मेहमान आते हैं विचारों के !पोजेटिव  विचारों के मेहमान भी पधारते हैं मन मे! और उन्ही के कारण ही व्यक्ति कुछ अच्छा और रचनात्मक कर जाता हैं। ये मन हैं साहब!मन !बहुत बारीकिय...

नारी रूप हैं शक्ति का

नारी रुप हैं शक्ति का ! क्यों कर दिया उसे निःशक्त हैं! सभी करते कोशिस हैं नारी पर  शक्ति को अपनी चलाने का ! जन्म होता हैं जब कन्या रूप नारी का , बाबुल का घर न  है उसका अमानत हैं वो  पराये की ,धन भी कही जाती हैं वो दूसरे का बन जाती जब नव युवती रूप नारी का बाबुल कर देते विदा थमा हाथ पुरुष पराये का होता हैं अब शुरू संघर्ष  नारी जीवन के अस्तित्व का कौन हैं वो ? क्या होगा नाम उसका ? किस घर से आई? क्या घर भी हैं कोई उसका ? जिस घर में थी जड़ें उसकी , उखड़ना था वहाँ से नियति उसकी , जिस घर में रोपने को जड़ें खुद की थी गई , वहाँ भी तो रही वो बन कर , घर पराये से हैं आई  की, घर पिता के रही! घर पति के रही! रही घर पुत्र के वो नारी थी न घर उसका बना कभी  रहा वो घर उन्हीं सब का नारी घर से बेघर ही रही , फिर भी नारी रूप हैं शक्ति का क्यों कर दिया उसे निःशक्त हैं! नारी तो रूप हैं त्याग समर्पण शक्ति का ! देती समर्पण पुरूष को  अपने प्यार की रति शक्ति का नारी अपना सर्वश्व लुटाती , देती अपनी कोख पुरूष को! लाने को वंशज उसके,पीढ़ी का देती वो अपने...

हमसफ़र

बहुत उम्मीद थी ,थी बहुत आरजू भी मेरी साथ चलने की तेरे ,बन के हमसफ़र तेरी हम कदम जो  बनते मेंरे तुम ,मैं हमनशीं तेरी फूल तो तुम ही थे , खुशबु मैं बन जाती तेरी अक्स मेरा ही हो उनमें ,बस वो निगाहें हो तेरी अश्क जो मेरे बहें आँखों से , बस वो पलकें हो तेरी गीत तेरे ही मैं गाउँ ,धुन हो  वो बस तेरी साज़ मेरे ही  बजे , राग उनमें हो बस तेरी  ‌

क्या कीजे

जख्म हो तन पर तो दवा कीजे,  घायल हैं रूह फिर क्या कीजे! कटे अंग की सिलाई कीजे, फटे मन फिर क्या कीजे! चोट लगे तीर कमानो से तो दिन दश-पाँच में भरा कीजे, बन जाते नासूर नश्तर शब्दबाणों के  फिर क्या कीजे! मैला हैं  लिबास तो जल से धुला कीजे, हो गर मन मैला फिर क्या कीजे! गिरे अर्स से फर्स पर तो कभी न कभी उठा कीजे, गिर जाए नजरों से फिर क्या कीजे! रूठे मानव, मनाया कीजे, रूठ जाये रब फिर क्या कीजे!

आ जा मुझे मुझसे मिलाने

 आ जा मुझे, मुझसे मिलाने मेरे होने का मुझे फिर से अहसास दिलाने! आह!कैसे काटूँ  जुदाई के ये वीराने ला दे मेरी खुशी के खोये खजाने आ जा मुझे ,मुझसे मिलाने! अपनी बाहों के घेरों में कशा दे विशाल सीने को सिरहाना बना दे आ जा मुझे मुझसे मिलादे तेरी निगाहों की चमक से मेरी आँखों में प्रेमदीप  जला ले होठों की अमृतधारा से मेरे अघरों को रसीला बना ले आ जा मुझे मुझसे मिला ले आ जा मुझे मुझसे मिलाने मेरे होने का मुझे फिर से अहसास दिलाने! आ जा मुझे मुझसे मिलाने!

आरक्षण का भष्मासुर

  आरक्षण या भष्मासुर 🙏नमस्कार सभी समाज के और वर्गों के माननीय सदस्यों को जो मेरे विचारों को पढ़ने की कृपा करेंगे और अपने सुझाव भी देंगे , मैं आज इस मंच के माध्यम से आरक्षण के सम्बंद में अपने विचार व्यक्त करना चाहती हूँ, क्योंकि इस आरक्षण रूपी भष्मासुर ने अब हमें अपने आप के साथ ही पूरे देश में रक्तबीज की तरह से फैलाना शुरू कर दिया है, हमारे देश के महानुभावों ने सायद सभी समाज के तबकों को और जातियों को बराबर उनत्ति के लिए इस आरक्षण की कुछ वर्षो तक व्यवस्था की थी ,लेकिन आज हालात क्या हैं ?आप सभी अच्छे से जानते हैं ,हाँ परवाह नहीं करते ये अलग बात हैं या कुछ देर इस पर बात करके रह जाते हैं और राजनीतिज्ञों की व राजनितिक पार्टियों की बुराई भर करके रह जाते हैं ! मैं आपसे जानना चाहती हूँ और खास कर उन भाइयों और बहनों से की क्या आज के इस वैश्वीकरण के युग में भी हमें यूँ वर्गीकृत और चयनित लाभ सरकारों से लेने की आवश्यकता क्यों हैं !क्यों हम अपने आप को अभी तक कमजोर वर्ग ही साबित किये हुए और उससे मिलने वाली खैरात के लिए अपने अपनो का खून बहाने में भी नही हिचकिचाते हैं देश की सार्वजनिक संम्पति को तो ...

रिश्ता

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यकीन

इतना यकीन हमने तुझ पर किया, केयकीन से भी अब तो यकीन उठने चला..  खुदा से भी  बढकर हमने, तेरी मोहब्बत की इतनी ईबादत की  के अब तो इबदतों से भी यकीन उठने चला..  अपना बनाकर अपनों से हमने इतनी यातनाएं सही के दुश्मनों से भी ज्यादा अब तो दोस्तों से यकीन उठने चला   तेरी  चाहत पर खुद को मिटाकर मोहब्बत की हद से    बढ़कर मोहब्बत ऐसी  तुझसे अलहदा हमने की   के अब तो इस जहां में मोहब्बत से यकीन उठने चला

आप हो तो मैं हूँ : ऑनलाइन महफिल

आप हो तो मैं हूँ : ऑनलाइन महफिल : ऑनलाइन महफ़िल सजी हैं भूली बिसरी यादें जगी हैं, सभी को अपनो के फोटोज को मंगवाने की दिल  में पहली बार प्यास जगी है, हर एक के मोबाईल की गै...