नारी रुप हैं शक्ति का ! क्यों कर दिया उसे निःशक्त हैं! सभी करते कोशिस हैं नारी पर शक्ति को अपनी चलाने का ! जन्म होता हैं जब कन्या रूप नारी का , बाबुल का घर न है उसका अमानत हैं वो पराये की ,धन भी कही जाती हैं वो दूसरे का बन जाती जब नव युवती रूप नारी का बाबुल कर देते विदा थमा हाथ पुरुष पराये का होता हैं अब शुरू संघर्ष नारी जीवन के अस्तित्व का कौन हैं वो ? क्या होगा नाम उसका ? किस घर से आई? क्या घर भी हैं कोई उसका ? जिस घर में थी जड़ें उसकी , उखड़ना था वहाँ से नियति उसकी , जिस घर में रोपने को जड़ें खुद की थी गई , वहाँ भी तो रही वो बन कर , घर पराये से हैं आई की, घर पिता के रही! घर पति के रही! रही घर पुत्र के वो नारी थी न घर उसका बना कभी रहा वो घर उन्हीं सब का नारी घर से बेघर ही रही , फिर भी नारी रूप हैं शक्ति का क्यों कर दिया उसे निःशक्त हैं! नारी तो रूप हैं त्याग समर्पण शक्ति का ! देती समर्पण पुरूष को अपने प्यार की रति शक्ति का नारी अपना सर्वश्व लुटाती , देती अपनी कोख पुरूष को! लाने को वंशज उसके,पीढ़ी का देती वो अपने...