रूठने का हक
रूठ जाऊँ तुमसे किसी बात पर मैँ गर,मनाने की चाहत भी रखूँ कैसे तुमसे !
तुमने रूठने का हक भी तो नही दिया है तुमसे!
आ सकते तुम पास नहीं मेरे जब
मिलने को दिल तड़पता हैं मेरा तुमसे!
तुमने पास आ करके मुझे मिलने का हक भी तो नहीं दिया हैं तुमसे !
करवटें बदलते रातों में तकिए से लिपट जाते हैं ,
दिलमें जगे अहसासों को दबाते हैं, उन्हें कैसे जाहिर करें तुमसे!
तुमने दिल के अरमानों को जाहिर करने को लिपटने का हक भी तो नहीं दिया है तुमसे!
करने को हजारों बातें दिल में बेताब हैं मगर कोई शिकायत नहीं करनी हैं तुमसे!
तुमने दिल के जज्बातों को बयां करने हक भी तो नहीं दिया हैं तुमसे!
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