चाहत
इतना चाहते अगर रब को , जितनी इबादत करते हम तुम्हारी मोहब्बत की,
तो रब भी मिलही जाते हमे !
या
फिर ये नाराजगी है हमसे रब की !कि उनसे ज्यादा हम कलमा पढ़ रहे नाम का तेरे!
और रब ही रूठे ऐसे हमसे की
गम जुदाई का सहना पड़ रहा हमे हैं तुमसे!
कैसे जियूँ एक पल भी तेरे बिना नहीं आता जीना, ऐसा बना दिया तुमने मुझेअपना दीवाना!
इस जीने से बेहतर हैं मुझे ए मेरे खुदा
तूँ अपने ही पास बुलाना!
जब वो सूरत न मिले निहारने को,
फिर निगाहे ही क्यों रहे मेरी कुछ भी देखने को!
साथ तेरा न मिले जिंदगी के सफ़र में साथ चलने को,
फिर हम जिंदा रहे ही क्यों ?
अकेले गम-ए-जुदाई का सफर करने को!
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