क्या कीजे
जख्म हो तन पर तो दवा कीजे,
घायल हैं रूह फिर क्या कीजे!
कटे अंग की सिलाई कीजे,
फटे मन फिर क्या कीजे!
चोट लगे तीर कमानो से तो दिन दश-पाँच में भरा कीजे,
बन जाते नासूर नश्तर शब्दबाणों के फिर क्या कीजे!
मैला हैं लिबास तो जल से धुला कीजे,
हो गर मन मैला फिर क्या कीजे!
गिरे अर्स से फर्स पर तो कभी न कभी उठा कीजे,
गिर जाए नजरों से फिर क्या कीजे!
रूठे मानव, मनाया कीजे,
रूठ जाये रब फिर क्या कीजे!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें